❗❗ पंचदेव साधना ❗❗
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साधनाओं और ज्ञान का क्षेत्र तो बहुत व्यापक है और असंख्य साधनात्मक प्रयोगों का वर्णन हमारे तंत्र शास्त्रों किया है,जो कि साधक के जीवन को सुखमय बनाने को लिए कारागार साबित होते है और साधक को उच्चभावभूमि में स्थापित करते हैं…जिससे वह अपने आपमें एक विशिष्ट साधक बन जाता हैं।
आज के समय में साधना के नाम में तो अनेक प्रकार के तांत्रिक साधक को गुमराह कर रहे हैं और उनके जीवन से खिलवाड कर रहें है जिससे साधक के जीवन का बहुमूल्य समय और उसके जीवन की एकत्रित की गई जमा पूंजी का केवल और केवल व्यय ही होता है और अंतत: जब साधक के हाथ कुछ नहीं लगता है तो वह हताश,निराश व दु:खी हो जाता है और उसका मन में अविश्वास घर कर जाता है और वह मंत्र,तंत्र,यंत्र जैसी विद्या को ढकोसला कहने लगता है ।ऐसा नहीं है कि यह सब ढकोसला पर जो तुम्हें गुरू मिले है उन्होंने तुम्हें अंधकार में रखा है और जिसके कारण तुम सही रूप से प्रमाणिक विधि विधानों से साधना नहीं कर पाये ।मंत्र तंत्र यंत्र में तो आज भी शक्ति निहित: है पर आवश्यकता है उनके सही विधान और प्रयोगों की….आप सबकी इसी समस्या के हेतु “अद्भुत सिद्धियां”” नामक मासिक पत्रिका में साधकों को सही ज्ञान और साधना को पूर्ण विधि विधान को साथ देने का संकल्प किया है,जिससे साधक साधना में सिद्धि प्राप्त कर सके और इसी संदर्भ में अन्य साधनाओं के साथ – साथ पत्रिका में “” पंचदेव साधना”नामक स्थाई स्तंभ शुरू किया है जिसमें पंचदेवों से संबंधित और उनके रूपों से संबंधित अनेक प्रकार लघु साधनायें दी जायेगी और ये लघु प्रयोग अपने- आपमें विशिष्ट प्रयोग है जिनके विषय में केवल यही कह सकते है कि “”” देखन में छोटे लागे घाव करे अति गम्भीर””
आप सब इन प्रसोगों को जरूर करें और अपने जीवन में हर प्रकार सुख,समृद्धि,ऐश्वर्य और आनंद से परिपूर्ण करें और अपने जीवन की समस्त बाधाओं को समूल रूप से नष्ट करें।
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सूर्य, गणेश,दुर्गा,शिव एवं विष्णु ये पांच देव कहलाते हैं। इनकी पूजा सभी कार्यों में गृहस्थ आश्रम में नित्य होनी चाहिए। इससे धन,लक्ष्मी और सुख प्राप्त होता है।
हमारे सनातन धर्म में प्रत्येक देवी-देवता का अपना एक महत्वपूर्ण स्थान है। लेकिन सभी देवताओं की साधना एवं पूजन विधि भिन्न है।हमारे साधनात्मक ग्रंथों,आगम -निगम शास्त्रों व पुराणों के अनुसार यदि नियत वस्तु और निमय से पूजन किया जाए तो जातक की हर मनोकामना पूरी होती है।
हमारे साधना ग्रंथों में अनेक प्रकार के देवी देवताओं की साधनाओं का वर्णन मिलता है …परंतु उनमें से पांच देवता ही प्रमुख माने गये है और साधक के जीवन में इन पांच देवताओं का स्थान अत्याधिक रहता है और इन्हीं की कृपा से साधक अपने जीवन में सभी सिद्धियों को हस्तगत करता जाता है और वैदिक काल से ही पंचदेवता पूजन व साधना का विधान प्रचलित है और यही पांच देवता ही पंच तत्व है और इनकी कृपा से कोई भी साधक अपने जीवन में उच्चकोटि की साधनाओं में निष्णात प्राप्त नहीं कर सकता है। ये पंचदेवता तो व्यक्ति के प्रत्येक जीवन के पडावों से जुडे हुये है ।













“सूर्य,गणेश,दुर्गा,शिव और विष्णु” ये पांच देव ही पंच देवता कहलाते है और इनकी साधना पूजन करने का विधान तो वैदिक काल से चलता आ रहा है …सूर्य जहां व्यक्ति के जीवन में उसके शरीर को निरोग रखता है और ओज तेज से परिपूर्ण करता है वहीं गणेश जी की साधना व्यक्ति के जीवन से समस्त संकटों,कष्टों,व विघ्न बाधाओं का निवारण करके जीवन को अत्यंत सरल सुगम्य बनाता है और तीसरी ओर माँ भगवती दुर्गा की कृपा जातक के अंदर शक्ति का जागरण होता है और उसका गृहस्थ जीवन की समस्त बाधायें व समस्यायें दूर हो जाती है ,गृहस्थ जीवन आनंदमय होकर पूर्णरूप से व्यतीत होता है और व्यक्ति के जीवन को खुशियों से भरपूर कर देती और साधक को अनेकों सिद्धियां प्रदान करती है वही भगवान शिव साधक के अंदर शक्ति व ,ऊर्जा को धारण करने क्षमता देते है और जातक को गृहस्थ के साथ साथ वैराग्यता का आनंद देते है और साधक की सुरक्षा आदि करते है और साधक का चहुं ओर से कल्याण होता है व ग्रह दोषादि का निवारण होता है और अकाल मृत्यु,कालसर्प योग आदि का निवारण करते है। वही दूसरी ओर भगवान विष्णु साधक को धैर्य ,संयम के साथ साथ लक्ष्मी,गृहस्थ जीवन की पूर्णता ,और परम पद कि प्राप्ति प्रदान करते है। यही तो विशेषता है पंचदेवों की ।आप अपने जीवन में इनकी साधनाओं को अवश्य करें

पंचदेव साधना पूजा से संबंधित कुछ नियम:-
सूर्य, गणेश,दुर्गा,शिव एवं विष्णु ये पांच देव कहलाते हैं और इन्ही देवताओं













के अनेक रूपों की साधना भी साधक कर सकतो है क्योंकि वे रूप भी इन्हीं के अंश है और यहां पे पंचदेव साधना के अंतर्गत साधकों को इन्हीं पंचदेवों की लघु साधना प्रयोग और इनके रूपों के लघु प्रयोग भी दिये जा रहें हैं।इनकी पूजा सभी कार्यों में व गृहस्थ आश्रम में नित्य होनी चाहिए। इससे धन,लक्ष्मी और सुख प्राप्त होता है और साधक को जीवन से समस्त दि:खों व समस्यों से मुक्ति प्राप्त कर लेता हैं।
१. गणेशजी और भैरवजी को तुलसी नहीं चढ़ानी चाहिए।
२. दुर्गाजी को दूर्वा नहीं चढ़ानी चाहिए।
३.सूर्य देव को शंख के जल से अर्घ्य नहीं देना चाहिए।
४. तुलसी का पत्ता बिना स्नान किये नहीं तोडना चाहिए जो लोग बिना स्नान किये तोड़ते हैं उनके तुलसी पत्रों को भगवान स्वीकार नहीं करते हैं।
५. रविवार,एकादशी,द्वादशी ,संक्रान्ति तथा संध्या काल में तुलसी नहीं तोड़नी चाहिए।
६.दूर्वा या दूब रविवार को नहीं तोड़नी चाहिए।
७. केतकी का फूल शंकर जी को नहीं चढ़ाना चाहिए।
८. कमल का फूल 5 रात्रि तक उसमें जल छिड़क कर चढ़ा सकते हैं।
९. बिल्व पत्र दस रात्रि तक जल छिड़क कर चढ़ा सकते हैं।
१०. तुलसी की पत्ती को 11 रात्रि तक जल छिड़क कर चढ़ा सकते हैं।
११. हाथों में रख कर हाथों से फूल नहीं चढ़ाना चाहिए।
१२. तांबे के पात्र में चंदन नहीं रखना चाहिए।
१३. दीपक से दीपक नहीं जलाना चाहिए जो दीपक से दीपक जलते हैं वो रोगी होते हैं।
१४. पतला चंदन देवताओं को नहीं चढ़ाना चाहिए।
१५.प्रतिदिन की पूजा में मनोकामना की सफलता के लिए दक्षिणा अवश्य चढ़ानी चाहिए।दक्षिणा में अपने दोष,दुर्गुणों को छोड़ने का संकल्प लें। अवश्य सफलता मिलेगीऔर मनोकामना पूर्ण होगी।17 चर्मपात्र या प्लास्टिक पात्र में गंगाजल नहीं रखना चाहिए।
१६.सभी देवी देवताओं की साधनाओं में साधक को ब्रह्मचर्य कि पालन करना अनिवार्य होता है और भूमि श्यन आदि करना भी साधना के दिनों में अनिवार्य होता है।
१७. एक ही समय में सात्विक आहार को भोजन के रूप में करना चाहिए और साधक दिन भर में फल और फलों निर्मित पेय रस का प्रयोग भी कर सकता है।

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इस क्रम मे प्रत्येक पंचदेवों से संबंधित कुछ ऐसी छोटी व सरल साधना प्रकाशित की जायेगी …जिनको करने के बाद जीवन सरल और सुगम हो जायेगा और समस्या से मुक्त जीवन प्राप्त कर सकेंगे!!

‼️बुद्धि गणेश साधना ‼️ ✨जिसकी कृपा बुद्धि या विकास होता है













✨स्मरण शक्ति तेज होती है
✨कवित्व शक्ति का संचार होता है व ज्ञान को समस्त तंतुओं का जागरण होता है।
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महर्षि वेदव्यास ने गणेश जी से वर मांगा कि मैं पुराण कथा बोलूं और आप लिखते जाएं ।गणेश जी ने वर देकर सारे पुराण स्वयं लिखे। साधकों यह है गणपति महिमा! बुद्धिनिधान भगवान गणेश की आराधना से बुद्धि प्राप्त होती है ,जिससे ज्ञान के तंतु खुल जाते है ,जातक की वाणी में निखार आ जाता है और स्मरण शक्ति तेज हो जाती है ।इसलिए आप इस साधना को अवश्य करें।
❗❗ मंत्र ❗❗
‼ ऊँ श्री गणेशाय नम: ‼
अनुष्ठान=÷ संकल्पपूर्वक भगवान गणेश जी की काले पत्थर की छोटी प्रतिमा जो १२ अंगुल से कम की हो ले लें और उसकी स्थापना साधना कक्ष में करके उसकी षोडशोपचार पूजा करें।
साधना में संकल्प जरूर लें ।फिर उपरोक्त मंत्र की रूद्राक्ष माला से नित्य एक माह तक ५००० संख्या मे नित्य जप करें। पहले और अंतिम दिन ही षोडशोपचार पूजन करें बाकी दिन पंचोपचार पूजन करें।
तो इस तरह से एक माह मे यह साधना सम्पन्न होने को बाद मंदबुद्धि में भी विलक्षण बुद्धि प्रकट हो जाती हैं कि लोग आश्चर्य करते है
नोट:- यह अनुष्ठान बुद्धि व स्मरण शक्ति को तेज करने के लिए अत्यंत अचूक प्रयोग है ,परंतु अनुष्ठान के बाद भी जप पूजा करते रहे।
भोग- भोग लड्डू का ही लगायें। ‼️सूर्य साधना ‼️

🔯जिससे साधक को प्राप्त होता है आयुष्य और आरोग्यता
🔯 जिससे साधक के जीवन में ऐश्वर्य और कीर्ति की उत्तरोतर वृद्धि होती है
🔯जिसके माध्यम से समस्त रोग व दोषों का शमन होता है
🔯 सुख सौभाग्य की वृद्धि व दु:ख -दारिद्रय का नाश होता है।
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सूर्य नवग्रहों में प्रधान देव और ग्रहाधिराज है …और इस सृष्टि का प्रकाश तेजपुंज है।सूर्य से ही हम अपने जीवन के अंधकार को नष्ट करने की क्षमता प्राप्त होती है …सूर्य केवल प्रकाश का ही सूचक नहीं है …सूर्य तो अपने आपमें विराटता कि सूचक है और परोपकार का सूचक ,ओज,तेज,और साहस एवं आत्मविश्वास का सूचक …पिता का सूचक …और शास्त्रों में यदि प्रत्यक्ष देव की बात आती है तो सूर्य और चंद्रमा को ही प्रत्यक्ष देव की संज्ञा दी गई है।सूर्य को तो जगत की आत्मा कहा गया है।सूर्य साधना से व्यक्ति को जीव

न में स्वास्थ्य व हृष्ट पुष्ट शरीर की प्राप्ति के साथ साथ आरोग्यता की प्राप्ति होती है। इसके अतिरिक्त सूर्य साधना से ऐश्वर्य और कीर्ति की प्राप्ति होती है और राजकीय कार्यों नें यदि अडचने आ रही है तो वे भी दूर हो जाती है और साधक को मान सम्मान की प्राप्ति होती है
यह साधना साधक रविवार ते दिन से शुरू करें और ग्यारह दिन की साधना है ।साधक प्रात:काल सूर्योदय से पूर्व ही स्नानादि करके शुद्ध लाल वस्त्र धारण और सूर्योदय के समय ही लाल आसन पर पूर्व की ओर मुख करके बैठ जायें।अब साधक ताम्रपात्र में शुद्ध जल ,गुड,लाल पुष्प ,लाल चन्दन डालकर सूर्य को अर्घ्य दें। ध्यान रहें कि यह अर्घ्य का पानी जमीन पर ना गिरे इसलिए नीचे दूसरा ताम्र पात्र रखें।अर्घ्य के समय मंत्र जप करते रहें। फिर साधना को शुरू करें।अब अपने सामने मंत्र सिद्ध “सूर्य यंत्र ” स्थापित करें। फिर साधना का संकल्प लें तत्पश्चात साधक गुरू ,गणेश का पूजन करके यंत्र का सामान्य पूजन करें।
उसके बाद साधक मंत्र सिद्ध””मूंगा माला”” से निम्न मंत्र की ११ माला जप करें।मंत्र जप करते समय दोनों भौंहों के मध्य भाग में भगवान सूर्य का ध्यान अवश्य करें।
❗❗ मंत्र ❗❗
‼ ऊं ह्रीं घृणि: सूर्य आदित्य: क्लीं ऊं ‼
इसके बाद साधक काले तिल,जौ,गुग्गल,कपूर आदि सामग्री को घी में मिलाकर शाकल तैयार करें और आम की लकडी को प्रज्वलित करके मंत्र पढते हुये १०८ आहुति दें।इस प्रकार से साधक यह साधना ११दिन तक करें। ग्यारह दिन पूर्ण होते ही साधक को स्वयं ही साधना की अद्भुतता का ज्ञान होगा और साधक को अपने ऊर्जा कि अहसास होगा तथा साधक को जीवन से सभी प्रकार की दरिद्रता ,रोग व दोष का शमन होगा।सुख-सौभाग्य की वृद्धि होगी।आयुष्य ,आरोग्य,ऐश्वर्य,और कीर्ति की उत्तोरतर वृद्धि होगी।ओज व तेज की वृद्धि ।यह अपने आप एक चमत्कारी साधना है आप इसे एक बार अवश्य करें।साधना काल में प्रत्येक रविवार को व्रत रखें और साधना काल के दिनों में भोजन नें नमक का प्रयोग ना करें।सूर्य साधना से संबंधित सभी नियमों का पालन करें।