लक्षणा शब्द शक्ति – जहाँ मुख्य अर्थ में बाधा उपस्थित होने पर रूढ़ि अथवा प्रयोजन के आधार पर मुख्य अर्थ से संबंधित अन्य अर्थ को लक्ष्य किया जाता है , वहाँ लक्षणा शब्द शक्ति होती है | जैसे – मोहन गधा है | यहाँ गधे का लक्ष्यार्थ है मूर्ख | आचार्य मम्मट के अनुसार – “मुख्यार्थ बाधे तद्योगे रूढ़ितोऽथ प्रयोजनात् | अन्योऽर्थो लक्ष्यते यत्सा लक्षणारोपिता क्रिया ||” 1 जहाँ मुख्यार्थ की बाधा हो 2 मुख्यार्थ से संबंधित लक्ष्यार्थ हो और 3 जहाँ रूढ़ि अथवा प्रयोजन हो , तो लक्षणा शब्द शक्ति होती है | जैसे – सिंह अखाड़े में उतर रहा है | यहाँ ‘सिंह’ वीर पुरुष के लिए रूढ़ हो गया है | लक्षणा शब्द-शक्ति का एक प्रकार है। लक्षणा, शब्द की वह शक्ति है जिससे उसका अभिप्राय सूचित होता है। कभी-कभी ऐसा होता है कि शब्द के साधारण अर्थ से उसका वास्तविक अभिप्राय नहीं प्रकट होता। वास्तविक अभिप्राय उसके साधारण अर्थ से कुछ भिन्न होता है। शब्द को जिस शक्ति से उसका वह साधारण से भिन्न और दूसरा वास्तविक अर्थ प्रकट होता है, उसे लक्षणा कहते हैं। शब्द का वह अर्थ जो अभिधा शक्ति द्वारा प्राप्त न हो बल्कि लक्षणा शक्ति द्वारा प्राप्त हो, लक्षितार्थ कहलाता है।