हिन्दी साहित्य “रस”

काव्यपाठ अथवा नाटक देखने से पाठक अथवा दर्शक के मन में जो आनंद उत्पन होता है, उसे ही रस (RAS) कहते हैं

रस का शाब्दिक अर्थ होता है निचोड़! काव्य में जो आनंद आता है काव्य रस होता है रस अन्तकरणः की वह शक्ति होती है जिसके कारण मन कल्पना करता है, स्वपन देखता है और काव्य के अनुसार विचरण करने लगता है

अर्थात काव्य या कविता साहित्य को पढ़ते समय हमें जिस आनंद व रस कि प्राप्ति होती है उसे रस कहते हैं

भरत मुनि ने सर्वप्रथम अपनी कृति नाट्यशास्त्र में रस का प्रयोग किया था

●परिभाषा :- जब विभाव अनुभाव तथा संचारी भाव से पुष्ट होकर नाम का स्थायी भाव उत्पन्न होता है वह रस कहलाता है

●रस के भेद

समान्यतः रस नौ प्रकार के होते हैं 

परन्तु वात्सल्य रस को दसवां एवं भक्ति रस को ग्यारहवां रस माना गया हैं : 

रस एवं उसके स्थायी भाव क्रमश निम्न प्रकार हैं

[रस]      [स्थायी भाव]     [आसान सी पहचान]

1. श्रंगार रस    रति         स्त्री पुरुष का प्रेम

2. हास्य रस    हास, हँसी     अंगों या वाणी के विकार से उत्पन्न उल्लास या हँसी

3. वीर रस    उत्साह       दया, दान और वीरता आदि को प्रकट करने में प्रसन्नता का भाव

4. करुण रस    शोक         प्रिय के वियोग या हानि के कारण व्याकुलता

5. शांत रस    निर्वेद, उदासीनता  संसार के प्रति उदासीनता का भाव

6. अदभुत रस   विस्मय, आश्चर्य   अनोखी वस्तु को देखकर या सुनकर आश्चर्य का भाव

7. भयानक रस  भय         बड़ा अनिष्ट कर सकने में समर्थ जीव या वस्तु को देखकर उत्पन्न व्याकुलता

8. रौद्र रस    क्रोध         काम बिगाड़ने वाले को दंड देने वाली मनोवृति

9. वीभत्स रस   जुगुप्सा        घिनौने पदार्थ को देखकर होने वाली ग्लानि

10. वात्सल्य रस वात्सल्यता, अनुराग संतान के प्रति माता-पिता का प्रेम भाव

11. भक्ति रस     देव रति         ईश्वर के प्रति प्रेम

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■《《श्रंगार रस》》

इसका स्थाई भाव रति होता है नायक और नायिका के मन में संस्कार रूप में स्थित रति या प्रेम जब रस कि अवस्था में पहुँच जाता है तो वह श्रंगार रस कहलाता है इसके अंतर्गत सौन्दर्य, प्रकृति, सुन्दर वन, वसंत ऋतु, पक्षियों का चहचहाना आदि के बारे में वर्णन किया जाता है

》》उदाहरण

दरद कि मारी वन-वन डोलू वैध मिला नाहि कोई

मीरा के प्रभु पीर मिटै, जब वैध संवलिया होई

मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई

जाके सिर मोर मुकुट मेरा पति सोई

बसों मेरे नैनन में नन्दलाल

मोर मुकुट मकराकृत कुंडल, अरुण तिलक दिये भाल

अरे बता दो मुझे कहाँ प्रवासी है मेरा

इसी बावले से मिलने को डाल रही है हूँ मैँ फेरा

कहत नटत रीझत खिझत, मिलत खिलत लजियात

भरे भौन में करत है, नैननु ही सौ बात

■《《हास्य रस》》

इसका स्थाई भाव हास होता है इसके अंतर्गत वेशभूषा, वाणी आदि कि विकृति को देखकर मन में जो विनोद का भाव उत्पन्न होता है उससे हास की उत्पत्ति होती है इसे ही हास्य रस कहते हैं

》》उदाहरण

विन्ध्य के वासी उदासी तपो व्रत धारी महा बिनु नारि दुखारे

गौतम तीय तरी तुलसी सो कथा सुनि भे मुनि वृन्द सुखारे

सीरा पर गंगा हसै, भुजानि में भुजंगा हसै

हास ही को दंगा भयो, नंगा के विवाह में

ह्रै ह्रै सिला सब चन्द्रमुखी परसे पद मंजुल कंज तिहारे

कीन्ही भली रघुनायक जू! करुना करि कानन को पगु धारे

■《《वीर रस》》

इसका स्थायी भाव उत्साह होता है इस रस के अंतर्गत जब युद्ध अथवा कठिन कार्य को करने के लिए मन में जो उत्साह की भावना विकसित होती है उसे ही वीर रस कहते हैं इसमें शत्रु पर विजय प्राप्त करने, यश प्राप्त करने आदि प्रकट होती है

》》उदाहरण

चढ़ चेतक पर तलवार उठा करता था भूतल पानी को

राणा प्रताप सर काट-काट करता था सफल जवानी को

बुंदेले हर बोलो के मुख हमने सुनी कहानी थी

खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी

मानव समाज में अरुण पड़ा जल जंतु बीच हो वरुण पड़ा

इस तरह भभकता राजा था, मन सर्पों में गरुण पड़ा

क्रुद्ध दशानन बीस भुजानि सो लै कपि रिद्द अनी सर बट्ठत

लच्छन तच्छन रक्त किये, दृग लच्छ विपच्छन के सिर कट्टत

माता ऐसा बेटा जानिये

कै शूरा कै भक्त कहाय

हम मानव को मुक्त करेंगे, यही विधान हमारा है

भारत वर्ष हमारा है,यह हिंदुस्तान हमारा है

सामने टिकते नहीं वनराज, पर्वत डोलते हैं,

कौतता है कुण्डली मारे समय का व्याल

मेरी बाँह में मारुत, गरुण, गजराज का बल है

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■《《करुण रस》》

इसका स्थायी भाव शोक होता है इस रस में किसी अपने का विनाश या अपने का वियोग, द्रव्यनाश एवं प्रेमी से सदैव विछुड़ जाने या दूर चले जाने से जो दुःख या वेदना उत्पन्न होती है उसे करुण रस कहते हैं यधपि वियोग श्रंगार रस में भी दुःख का अनुभव होता है लेकिन वहाँ पर दूर जाने वाले से पुनः मिलन कि आशा बंधी रहती है

अर्थात् जहाँ पर पुनः मिलने कि आशा समाप्त हो जाती है करुण रस कहलाता है इसमें निःश्वास, छाती पीटना, रोना, भूमि पर गिरना आदि का भाव व्यक्त होता है

या किसी प्रिय व्यक्ति के चिर विरह या मरण से जो शोक उत्पन्न होता है उसे करुण रस कहते है

》》उदाहरण

हाय राम कैसे झेलें हम अपनी लज्जा अपना शोक

गया हमारे ही हाथों से अपना राष्ट्र पिता परलोक

हुआ न यह भी भाग्य अभागा

किस पर विकल गर्व यह जागा

रहे स्मरण ही आते

सखि वे मुझसे कहकर जाते

अभी तो मुकुट बंधा था माथ

हुए कल ही हल्दी के हाथ

खुले भी न थे लाज के बोल

खिले थे चुम्बन शून्य कपोल

हाय रुक गया यहीं संसार

बना सिंदूर अनल अंगार

वातहत लतिका वह सुकुमार

पड़ी है छिन्नाधार!

धोखा न दो भैया मुझे, इस भांति आकर के यहाँ

मझधार में मुझको बहाकर तात जाते हो कहाँ

सीता गई तुम भी चले मै भी न जिऊंगा यहाँ

सुग्रीव बोले साथ में सब (जायेंगे) जाएँगे वानर वहाँ

दुःख ही जीवन की कथा रही

क्या कहूँ, आज जो नहीं कहीं

रही खरकती हाय शूल-सी, पीड़ा उर में दशरथ के

ग्लानि, त्रास, वेदना – विमण्डित, शाप कथा वे कह न सके

■《《शान्त रस》》

इसका स्थायी भाव निर्वेद (उदासीनता) होता है इस रस में तत्व ज्ञान कि प्राप्ति अथवा संसार से वैराग्य होने पर, परमात्मा के वास्तविक रूप का ज्ञान होने पर मन को जो शान्ति मिलती है वहाँ शान्त रस कि उत्पत्ति होती है जहाँ न दुःख होता है, न द्वेष होता है मन सांसारिक कार्यों से मुक्त हो जाता है मनुष्य वैराग्य प्राप्त कर लेता है शान्त रस कहा जाता है

》》उदाहरण

जब मै था तब हरि नाहिं अब हरि है मै नाहिं

सब अँधियारा मिट गया जब दीपक देख्या माहिं

देखी मैंने आज जरा

हो जावेगी क्या ऐसी मेरी ही यशोधरा

हाय! मिलेगा मिट्टी में वह वर्ण सुवर्ण खरा

सुख जावेगा मेरा उपवन जो है आज हरा

लम्बा मारग दूरि घर विकट पंथ बहुमार

कहौ संतो क्युँ पाइए दुर्लभ हरि दीदार

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■《《अदभुत रस》》

इसका स्थायी भाव आश्चर्य होता है जब ब्यक्ति के मन में विचित्र अथवा आश्चर्यजनक वस्तुओं को देखकर जो विस्मय आदि के भाव उत्पन्न होते हैं उसे ही अदभुत रस कहा जाता है इसके अन्दर रोमांच, औंसू आना, काँपना, गद्गद होना, आँखे फाड़कर देखना आदि के भाव व्यक्त होते हैं

》》उदाहरण

देख यशोदा शिशु के मुख में, सकल विश्व की माया

क्षणभर को वह बनी अचेतन, हिल न सकी कोमल काया

देखरावा मातहि निज अदभुत रूप अखण्ड

रोम रोम प्रति लगे कोटि-कोटि ब्रह्माण्ड

■《《भयानक रस》》

इसका स्थायी भाव भय होता है जब किसी भयानक या अनिष्टकारी व्यक्ति या वस्तु को देखने या उससे सम्बंधित वर्णन करने या किसी अनिष्टकारी घटना का स्मरण करने से मन में जो व्याकुलता उत्पन्न होती है उसे भय कहते हैं उस भय के उत्पन्न होने से जिस रस कि उत्पत्ति होती है उसे भयानक रस कहते हैं इसके अंतर्गत कम्पन, पसीना छूटना, मुँह सूखना, चिन्ता आदि के भाव उत्पन्न होते हैं

》》उदाहरण

अखिल यौवन के रंग उभार, हड्डियों के हिलाते कंकाल

कचो के चिकने काले, व्याल, केंचुली, काँस, सिबार

एक ओर अजगर हिं लखि, एक ओर मृगराय

विकल बटोही बीच ही, पद्यो मूर्च्छा खाय

■《《रौद्र रस》》

इसका स्थायी भाव क्रोध होता है जब किसी एक पक्ष या व्यक्ति द्वारा दुसरे पक्ष या दुसरे व्यक्ति का अपमान करने अथवा अपने गुरुजन आदि कि निन्दा से जो क्रोध उत्पन्न होता है उसे रौद्र रस कहते हैं इसमें क्रोध के कारण मुख लाल हो जाना, दाँत पिसना, शास्त्र चलाना, भौहे चढ़ाना आदि के भाव उत्पन्न होते हैं

》》उदाहरण

उस काल मरे क्रोध के तन काँपने उसका लगा

मानो हवा के जोर से सोता हुआ सागर जगा

अतिरस बोले वचन कठोर

बेगि देखाउ मूढ़ नत आजू

उलटउँ महि जहँ जग तवराजू

■《《वीभत्स रस》》

इसका स्थायी भाव जुगुप्सा होता है घृणित वस्तुओं, घृणित चीजो या घृणित व्यक्ति को देखकर या उनके संबंध में विचार करके या उनके सम्बन्ध में सुनकर मन में उत्पन्न होने वाली घृणा या ग्लानि ही वीभत्स रस कि पुष्टि करती है दुसरे शब्दों में वीभत्स रस के लिए घृणा और जुगुप्सा का होना आवश्यक होता है

》》उदाहरण

आँखे निकाल उड़ जाते, क्षण भर उड़ कर आ जाते

शव जीभ खींचकर कौवे, चुभला-चभला कर खाते

भोजन में श्वान लगे मुरदे थे भू पर लेटे

खा माँस चाट लेते थे, चटनी सैम बहते बहते बेटे

सिर पर बैठो काग, आँखि दोउ खात निकारत

खींचत जी भहिं स्यार, अतिहि आनन्द उर धारत

गिद्ध जाँघ कह खोदि-खोदि के मांस उचारत

स्वान आँगुरिन काटि-काटि के खान बिचारत

बहु चील्ह नोंचि ले जात तुच, मोद मठ्यो सबको हियो

जनु ब्रह्म भोज जिजमान कोउ, आज भिखारिन कहुँ दियो

■《《वात्सल्य रस》》

इसका स्थायी भाव वात्सल्यता (अनुराग) होता है माता का पुत्र के प्रति प्रेम, बड़ों का बच्चों के प्रति प्रेम, गुरुओं का शिष्य के प्रति प्रेम, बड़े भाई का छोटे भाई के प्रति प्रेम आदि का भाव स्नेह कहलाता है यही स्नेह का भाव परिपुष्ट होकर वात्सल्य रस कहलाता है

》》उदाहरण

बाल दसा सुख निरखि जसोदा, पुनि पुनि नन्द बुलवाति

अंचरा-तर लै ढ़ाकी सूर, प्रभु कौ दूध पियावति

सन्देश देवकी सों कहिए

हौं तो धाम तिहारे सुत कि कृपा करत ही रहियो

तुक तौ टेव जानि तिहि है हौ तऊ, मोहि कहि आवै

प्रात उठत मेरे लाल लडैतहि माखन रोटी भावै

■《《भक्ति रस》》

इसका स्थायी भाव देव रति है इस रस में ईश्वर कि अनुरक्ति और अनुराग का वर्णन होता है अर्थात इस रस में ईश्वर के प्रति प्रेम का वर्णन किया जाता है

》》उदाहरण

अँसुवन जल सिंची-सिंची प्रेम-बेलि बोई

मीरा की लगन लागी, होनी हो सो होई

उलट नाम जपत जग जाना

वल्मीक भए ब्रह्म समाना

एक भरोसो एक बल, एक आस विश्वास

एक राम घनश्याम हित, चातक तुलसीदास