भाषा, व्याकरण एव लिपि

भाषा :-
हमारे भावों और विचारों की अभिव्यक्ति के लिए रूढ़ अर्थों में जो ध्वनि संकेतों की व्यवस्था प्रयोग में लायी जाती है उसे भाषा कहते हैं। अथार्त जब हम अपने विचारों को लिखकर या बोलकर प्रकट करते हैं और दूसरों के विचारों को सुनकर या पढकर ग्रहण करते हैं उसे भाषा कहते हैं।

नयी ध्वनि निकली उनसे और वर्ण बने। वर्णों को जोड़ा गया जिससे शब्द बने और शब्दों को जोड़ने पर पद बने तथा पदों को जोड़ने पर वाक्य बने फिर इसी तरह से भाषा का विकास हुआ। भाषा शब्द को संस्कृत की ‘ भाष ‘ धातु से लिया गया है जिसका अर्थ होता है बोलना।

संस्कृत भाषा को हिंदी भाषा की जननी माना जाता है। हमें पता है कि भाषा का लिखित आज भी संस्कृत में पाया जा सकता है। लेकिन मौखिक रूप मुख से घिस घिसकर अपना स्वरूप खो चुके हैं आज हम उन्हें तद्भव शब्दों के रूप में जानते हैं। हिंदी भाषा को अपने अस्तित्व में आने के लिए बहुत समय लग गया है। पहले संस्कृत से पालि , पालि से प्राकृत , प्राकृत से अपभ्रंश तब अपभ्रंश से हिंदी भाषा का विकास हुआ है।

भाषा के भेद :- 1. लिखित भाषा 2. मौखिक भाषा

  1. लिखित भाषा :-

जब हम दूर बैठे किसी व्यक्ति से अपनी बातें लिखकर व्यक्त करते हैं तो उसे लिखित भाषा कहते हैं। यह भाषा का स्थायी रूप होता है। ये लिपि पर आधारित होती हैं। इससे अपने अस्तित्व को सुरक्षित रखा जा सकता है।

जैसे :- ग्रन्थ , पुस्तकें , अख़बार , पत्र -पत्रिकाएँ आदि।

  1. मौखिक भाषा :-

जब हम अपने विचारों को बोलकर या सुनकर व्यक्त करते हैं तो उसे मौखिक भाषा कहते हैं इसमें दो व्यक्तियों के बीच में बात हो रही हो और तीसरा भाषण से अपने विचारों को बताये तब मौखिक भाषा का ही प्रयोग होता है। मौखिक भाषा का सबसे अधिक प्रयोग नाटकों में होता है।

जैसे :- नाटक , फिल्म , समाचार सुनना आदि।

भाषा के भेद :- 1. मातृभाषा 2. राजभाषा 3. राष्ट्रभाषा 4. मानक भाषा

  1. मातृभाषा :- जिस भाषा को बालक बचपन में अपनी माँ से सीखता है उसे मातृभाषा कहते हैं।
  2. राजभाषा:– जब किसी देश में सरकारी काम में भाषा का प्रयोग होता है उसे राजभाषा कहते हैं अंग्रेजी हमारी सह राजभाषा है।
  3. राष्ट्रभाषा :- भारत में अनेक भाषाएँ बोली , पढ़ी , लिखी , सुनी जाती हैं। सब प्रदेशों की अपनी अलग भाषा होती है। भारतीय संविधान ने 22 भाषाओँ को स्वीकार किया है – संस्कृत , हिंदी , अंग्रेजी , उर्दू , असमिया , पंजाबी , नेपाली , तमिल , तेलुगु , कन्नड़ , गुजराती , बांग्ला , उड़िया , कश्मीरी , कोंकणी , मणिपुर , मराठी , मलयालम , मैथिलि , डोंगरी , बोडो , संथाली और सिंधी आदि। इन सभी भाषाओँ का प्रयोग अपने अपने क्षेत्र में ही किया जाता है पर हिंदी को पुरे भारत में बोली जाता है इसलिए इसे राष्ट्रभाषा कहते हैं।
  4. मानक भाषा :- मानक हिंदी हिंदी भाषा का ही मानक रूप होता है इसे शिक्षा , कार्यालयीन कामों में प्रयोग किया जाता है। हम जानते हैं की भाषा का क्षेत्र काल और पात्र की दृष्टि से व्यापक होता है। सभी भाषाओँ के विविध रूप को मानक कहते हैं।

भाषा और बोली :-

छोटे भूभाग में बोली जाने वाली भाषा को बोली कहते हैं। बोली को भाषा का प्रारंभिक रूप माना जाता है बोली भाषा का स्थानीय रूप होती है। हम जानते हैं कि हर दस किलोमीटर के बाद बोली बदल जाती है। बोली पहले तो उपभाषा बनती है फिर भाषा में बदलती है। भाषा व्याकरणिक नियमों से बंधी होती है लेकिन बोली स्वतंत्र होती है।

जब कोई भाषा बहुत बड़े भाग में बोली जाती है तो वह क्षेत्र में बंट जाता है और बोली बोली जाने लगती है। कोई भी बोली हो वो विकसित होकर भाषा का रूप ही लेती है। हिंदी को भी एक समय में बोली माना जाता था। क्योकि इसका विकास खड़ी बोली से हुआ था। हम जानते हैं की बोली का स्वरूप मानक नहीं होता लेकिन भाषाका स्वरूप मानक होता है।

बोली को लिख नहीं सकते इसलिए इसका साहित्य मौखिक होता है लेकिन भाषा को लिखा जा सकता है इसलिए इसका साहित्य लिखित होता है। जब कोई बोली विकसित होती है तो वह साहित्य की भाषा का रूप ले लेती है। हम जानते हैं कि जब कोई भाषा परिनिष्ठित होकर साहित्य की भाषा के पद पर आसीन हो जाती है तो उसकी लोकभाषा की उपस्थिति जरूरी होती है।

जैसे :- पूर्वी उत्तर प्रदेश की बोली अवधी है , बिहार की भोजपुरी और मैथिलि , हरियाणा में हरियाणवी और बांगड़ू , राजस्थान में राजस्थानी , मारवाड़ी और गुजराती बोली बोली जाती है।

हिंदी और अन्य भारतीय भाषाएँ :-

भारत एक बहुभाषी देश है। भारत में बहुत सी भाषाएँ बोली जाती हैं। हिंदी को सारे भारत में बोला और समझा जाता है। हिंदी भाषा को भारत में शिक्षा और संचार का माध्यम माना जाता है। हिंदी को राजभाषा का दर्जा संविधान ने 14 सितम्बर 1949 को दिया था इसलिए 14 सितम्बर को हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है।

हिंदी को अनेक राज्यों की राजभाषा घोषित किया गया है। क्योकि महात्मा गाँधी , सुभाषचन्द्र बोश जैसे स्वतन्त्रता सेनानियों ने इसे राजभाषा का गौरव दिलाया था। भारत में हिंदी बोलने वालों की संख्या 70 % है जिसका एक करण हिंदी फ़िल्में और नाटक भी हैं।

हिंदी का व्यवहार क्षेत्र :-

हिंदी केवल भारत में ही नहीं बल्कि विश्व के अनेक देशों में रह रहे लोग हिंदी को बोलते व् समझते है। बहुत से देश जैसे रोमेनिया , लन्दन , मोरिशस की 50 % आबादी हिंदी बोलती और समझती है। विश्व के बहुत से विश्व विद्यालयों में हिंदी पढाई जाती है | हिंदी अब भारत की पहचान बढ़ाती जा रही है।

हिंदी और कम्प्यूटर :-

हम जानते हैं कि कम्प्यूटर में भी हिंदी का बहुत प्रयोग किया जाता है। हिंदी की वजह से इन्टरनेट का प्रयोग बढ़ रहा है। लोग हिंदी में पत्र लिखने की जगह पर मेसेज और इमेल करने लगे है। कम्प्यूटर में भी हिंदी का प्रयोग बहुत बढ़ चढ़ कर हो रहा है।

लिपि :-

किसी भाषा को लिखने के लिए जिन चिन्हों की जरूरत होती है उन चिन्हों को लिपि कहते है। लिपि भाषा का लिखित रूप होता है। इसके माध्यम से मौखिक रूप की ध्वनियों को लिखकर प्रकट करने के लिए लिपि का प्रयोग किया जाता है। सारी भाषाओँ के लिखने की लिपि अलग होती है। हिंदी की लिपि देवनागरी होती है , अंग्रेजी भाषा की लिपि रोमन , उर्दू की लिपि फारसी और पंजाबी की लिपि गुरुमुखी है।

देवनागरी लिपि की विशेषताएं :-

  1. इसे दाएं से बाएं लिखा जाता है।
  2. हर वर्ण का आकार समान होता है।
  3. ये उच्चारण के अनुरूप लिखी जाती हैं।

व्याकरण :-

व्याकरण वह शास्त्र है जिससे भाषा को शुद्ध लिखने , बोलने और पढने का ज्ञान सीखा जाता है। शुद्ध लिखने के लिए व्याकरण को जानने की बहुत जरूरत होती है। व्याकरण से भाषा को बोलना और लिखना आसान होता है। व्याकरण से हमें भाषा की शुद्धता का ज्ञान होता है। भाषा को प्रयोग करने के लिए हमें भाषा के नियमों को जानने की जरूरत है।

इन्ही नियमों की जानकारी हमें व्याकरण से मिलती है। प्रयोग के आधार पर भाषा की इकाई वाक्य होती है। व्याकरण हमे वाक्यों के गठन में पदों और पदबंधों की जानकारी देता है।

व्याकरण और भाषा का संबंध :-

कोई भी व्यक्ति व्याकरण को जाने बिना भाषा नहीं सीख सकता है। इसी वजह से भाषा और व्याकरण का बहुत गहरा संबंध है। व्याकरण को भाषा के उच्चारण , प्रयोग , अर्थों के प्रयोग के रूप को निश्चित करता है।

व्याकरण के अंग :- 1. वर्ण विचार 2. शब्द विचार 3. पद विचार 4. वाक्य विचार

  1. वर्ण विचार :- इस विचार में वर्णों के उच्चारण , रूप , आकार , भेद , वर्णों को मिलाने की विधि , लिखने की विधि बताई जाती है।
  2. शब्द विचार :- इस विचार में शब्दों के भेद , व्युत्पत्ति , रचना , रूप , प्रयोगों , उत्पत्ति आदि का अध्ययन करवाया जाता है।
  3. पद विचार :- इस विचार में पद का तथा पद के भेदों का वर्णन किया जाता है।
  4. वाक्य विचार :- इस विचार में वाक्यों की रचना , उनके भेद , वाक्य बनाने , वाक्यों को अलग करने , विराम चिन्हों , पद परिचय , वाक्य निर्माण , गठन , प्रयोग , उनके प्रकार आदि का अध्ययन करवाया जाता है।

साहित्य :-

ज्ञान राशि के संचित कोष को साहित्य कहा जाता है। साहित्य की रचना गद्य और पद्य दोनों में की जा सकती है। साहित्य के माध्यम से किसी भी देश , जाति , वर्ग को जीवित रखकर उसके अतीत रूपों को दर्शाया जाता है। ये मनुष्य की अनुभूति के विभिन्न पक्षों को स्पष्ट करता है। काव्य , नाटक , निबन्ध , कहानी सभी ही साहित्य के अंतर्गत आते हैं।