2- #अर्थालंकार

अर्थालंकार के प्रकार-

1- उपमा अलंकार

2-प्रतीप अलंकार

3- उपमेयोपमा अलंकार

4- अनन्वय अलंकार

5- संदेह अलंकार

6- उत्प्रेक्षा अलंकार

7- रूपक अलंकार

8- अपह्नुति अलंकार

9- अतिशयोक्ति अलंकार

10- उल्लेख अलंकार

11- स्मरण अलंकार

12- भ्रांतिमान अलंकार

13- दीपक अलंकार

14- प्रतिवस्तूपमा अलंकार

15- दृष्टान्त

16- निर्दशना

17- व्यतिरेक

18- सहोक्ति

19- विनोक्ति

20- समासोक्ति

21- अन्योक्ति/ अप्रस्तुत

22- पर्यायोक्ति

23- व्याजस्तुति

24- परिकराँकुर

25- आक्षेप

26- विरोधाभास

27- विभावना

28- विशेषोक्ति

29- असंगति

30- विषम

31- कारणमाला

32- एकावली

33- काव्यलिंग

34- सार

35- अनुमान

36- यथासंख्य/क्रम

37- अर्थापत्ति

38- परिसंख्या

39- सम

40- तद्गुण

41- अतद्गुण

42- मीलित

43- उन्मीलित

44- सामान्य

45- स्वाभावोक्ति

46- व्याजोक्ति

47- अर्थान्तरन्यास

48- लोकोक्ति

49- उदाहरण

50- तुल्ययोगिता

51- परिकर

1-उपमा अलंकार-
भिन्न पदार्थों का सादृश्य उपस्थित किया जाये वहाँ, उपमा अलंकार होता है|

उपमा के 4 अंग होते हैं-

A-उपमेय/प्रस्तुत- जिसकी उपमा दी जाय(मुख)

B-उपमान/अप्रस्तुत- जिससे उपमा दी जाय(चाँद/चन्द्र)

C- समान धर्म/ गुण- उपमेय और उपमान में पाया जाने वाला उभयनिष्ठ गुण (सुन्दर)

D- सादृश्य वाचक शब्द- उपमेय व उपमान की समता बताने वाला शब्द(सा,जैसा,समान)

उदाहरण- सीता का मुख चन्द्र के समान सुन्दर है|

उपमा के भी 2 भेद होते हैं-
क- पूर्णोपमा- जिसमें उपमा के चारों अंग मौजूद हों,
उदा. मुख चन्द्र सा सुन्दर है |

ख- लुप्तोपमा- जहाँ उपमा के किसी एक या दो अंग का लोप(अनुपस्थित)हो,
उदा. मुख चन्द्र सा है| (यहाँ सुन्दर(समान धर्म का) लोप है|

2- प्रतीप अलंकार-
ये उपमा का विपरीत होता है| यहाँ उपमान को उपमेय बना दिया जाता है
उदा. मुख सा चन्द्र है|

3- उपमेयोपमा अलंकार- प्रतीप+ उपमा अर्थात् ये प्रतीप और उपमा का मिलाजुला रूप है
उदा. मुख सा चंद्र और चंद्र सा मुख|

4- अनन्वय अलंकार- एक ही वस्तु को उपमेय और उपमान दोनों कहना
उदा. मुख मुख ही सा है|
राम से राम, सिया सी सिया|

5- संदेह अलंकार- उपमेय में उपमान का संदेह
उदा. यह मुख है या चन्द्र|
सारी बीच नारी है कि नारी बीच सारी, सारी ही की नारी है या नारी की ही सारी|

6- उत्प्रेक्षा अलंकार-
जहाँ उपमेय में उपमान की सम्भावना हो

इसकी पहचान कुछ इन शब्दों से की जाती है(मानो,मनहु,मनु,जानो,जनु,जनहु)

उदा. मुख मानो चन्द्र है|

7- रूपक अलंकार-
उपमेय में उपमान का आरोप होने पर(निषेधरहित आरोप)
उदा. मुख चन्द्र है|

8- अपह्नुति अलंकार-
उपमेय में उपमान का आरोप (निषेधसहित)
उदा. यह मुख नहीं चन्द्र है|

9- अतिशयोक्ति अलंकार-
उपमेय न होकर केवल उपमान के साथ अभिन्नता प्रदर्शित करना( बहुत बढ़ा चढ़कर कही गयी बात)
उदा. यह चन्द्र है|

10- उल्लेख अलंकार- विषय भेद से एक वस्ति का अनेक प्रकार से वर्णन(उल्लेख)
उदा. उसके मुख ह
को कोई कमल कोई चन्द्र कहता है|
जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरति देखी तिन तैसी….. |

11- भ्रांतिमान अलंकार- सादृश्यता के कारण एक वस्तु को दूसरी वस्तु मान लेना( यानी भ्रम हो जाना)
उदा. नाक का मोती अधर की कान्ति से, बीज दाड़िम का समझ भ्रांति से,
देखकर सहसा हुआ शुक मौन है,सोचता है यह अन्य शुक कौन है|

ध्यान दें:-
संदेह और भ्रांतिमान में अन्तर-
भ्रांतिमान में सादृश्यता का आभास सत्य मान लिया जाता ह(जैसेै शुक ने भ्रम के कारण दूसरे शुक को ही मान लिया है) जबकि संदेह में दुविधा(संदेह) बनी रहती है कि ये होगा या वो? (जैसे- सारी है या नहीं इसमें बात स्पष्ट नहीं है यानी संदेह बना हुआ है)

12- दृष्टान्त अलंकार- उपमेय-उपमान में बिम्ब+प्रतिबिम्ब भाव( भाव साम्य- एक की आशय की दो भिन्न अभिव्यक्ति)
उदा. उसका मुख निसर्ग(प्राकृतिक रूप) सुन्दर है,चंद्रमा को प्रसाधन की क्या आवश्यकता?
मूल आशय- सुन्दर वस्तु का स्वाभाविक रूप से सुन्दर लगना|

13-व्यतिरेक अलंकार- उपमान की अपेक्षा उपमेय का व्यतिरेक अर्थात् उत्कर्ष वर्णन
उदा. चन्द्र सकलंक,मुख निष्कलंक, दोनों में समता कैसी?

14- समासोक्ति अलंकार- प्रस्तुत के माध्यम से अप्रस्तुत का वर्णन
उदा. चंप लता सुकुमार तू, धन तुव भाग्य बिसाल|
तेरे ढिग सोहत सुखद,सुन्दर स्याम तमाल||
अर्थात् अरी चम्पक लता! तू बड़ी कोमल है, तू धन्य और बड़ी भाग्यशालिनी है जो तेरे समीप सुखद,सुन्दर श्याम तमाल शोभा दे रहे हैं| (प्रत्यक्ष)

“चम्पक लता” व “तमाल” के माध्यम से यहाँ “राधा” व “कृष्ण” का वर्णन है|

15- अन्योक्ति अलंकार- ये समासोक्ति का उलटा है यानी इसमें अप्रस्तुत के माध्यम से प्रस्तुत का वर्णन किया जाता है
उदा. नहि पराग नहि मधुर मधु नहि विकास इहि काल|
अलि कलि ही सो विंध्यौं, आगे कौन हवाल||
यहाँ भ्रमर और कली का प्रसंग अप्रस्तुत विधान के रूप में है जिसके माध्यम से राजा जलसिंह को सचेत किया जा रहा है|

16- विरोधाभास- विरोध न होने पर भी विरोध का आभास
उदा. मीठी लगे अँखियन लुनाई|

17- विभावना अलंकार-
कारण के अभाव में कार्य की उत्पत्ति का वर्णन
उदा. बिनु पद चला, सुनै बिनु काना|
कर बिनु करम करै बिधि नाना||

18- असंगति अलंकार- कारण और कार्य में संगति का अभाव(कारण कहीं और, कार्य कहीं और)

उदा. दृग उरझत टूटत कुटुम्ब|
दृग(आँखे) उलझती हैं टूटना भी उन्हें ही चाहिए जबकि कुटुम्ब टूटना बताया गया है इसलिए यहाँ असंगति है|

19- काव्यलिंग अलंकार- किसी कथन का कारण देना (पहचान चिह्न- जिसमें, क्योंकि, इसलिए, चूँकि आदि की सहायता से अर्थ प्रकट हो)
उदा. कनक कनक के सौ गुनी मादकता अधिकाय|
वा खाय बौराय जग या पाय बौराय||

सोना धतूरे की अपेक्षा सौ गुना अधिक मादक होता है “क्योंकि” धतूरे को खाने पर नशा होता है और सोना हाथ में आने पर|

20- यथासंख्य अलंकार- कुछ पदार्थों का उल्लेख करके उसी क्रम से उनसे संबद्ध अन्य पदार्थों, गुणों या कार्यों का वर्णन
उदा. मनि मानिक मुकता छवि जैसी|
अहि गिरि गजसिर लोग न तैसी||

यहाँ प्रथम चरण में मणि, माणिक्य और मुक्ता का कथन जिस क्रम में है द्वितीय चरण में उसी क्रम से उनको जोड़ना पड़ता है
यानी मणि सर्प(अहि) के सिर पर, माणिक्य पर्वत(गिरि) पर और मुक्ता हाथी(गज) के मस्तक पर उत्पन्न होती है|

21- मीलित अलंकार- अनुरूप वस्तु के द्वारा किसी वस्तु का छिप जाना
उदा. बरन बास सुकुमारता, सब बिध रही समाय|
पंखुरी लगी गुलाब की, गाल न जानी जाय||

अर्थात् गुलाब की पंखुड़ी नायिका के गाल पर सटी है रंग,गंध और कोमलता के सादृश्यता के कारण उस गुलाब की पंखुड़ी का अलग से ज्ञान नहीं होता|

22- अर्थान्तरन्यास अलंकार- सामान्य का विशेष से या विशेष का सामान्य से समर्थन करना
उदा. जे रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग|
चंदन विष व्याप्त नहीं,लिपटे रहत भुजंग||
प्रथम चरण- सामान्य बात
द्वितीय चरण- विशेष बात

23- लोकोक्ति अलंकार- प्रसंगवश लोकोक्ति का प्रयोग करना
उदा अब पछतावा क्या करे, “चिड़िया चुग गयी खेत”

24- उदाहरण अलंकार-
एक वाक्य कहकर उसके उदाहरण के रूप में दूसरा वाक्य कहना
उदा. वे रहीम नर धन्य हैं, पर उपकारी अंग|
बाँट वारे को लगे, “ज्यों” मेंहदी को रंग||

ध्यान दें:- दृष्टान्त और उदाहरण में अन्तर-
दृष्टान्त में बिम्ब द्वारा भाव रहता है और वाचक शब्द(ज्यों,जैसे आदि) “नहीं” होता जबकि उदाहरण अलंकार में वाचक शब्द के द्वारा समानता प्रदर्शित की जाती है|

*अगली कड़ी में पाश्चात्य/आधुनिक अलंकार