1919 में पेरिस पीस कंफ्रेंस के दौरान कमीशन ऑफ रेसपोंसिबिलिटीज के द्वारा युद्ध अपराध के आरोपी राजनीतिक नेताओं पर मुकदमा चलाने के लिए पहली बार अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरण की स्थापना की गई। 1-16 नवम्बर 1937 को लीग ऑफ नेशंस के तत्वावधान में जेनेवा में आयोजित सम्मेलन में इस मुद्दे को एक बार फिर उठाया गया, लेकिन कोई व्यावहारिक परिणाम हासिल नहीं हुआ। संयुक्त राष्ट्र ने कहा कि नुरेमबर्ग और टोक्यो न्यायाधिकरण के बाद 1948 में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान हुए इस प्रकार के अत्याचार को निपटने के लिए महासभा ने पहली बार स्थायी अंतरराष्ट्रीय अदालत की होने की आवश्यकता को पहचाना है।महासभा के अनुरोध पर, 1950 के दशक के प्रारम्भ में अंतर्राष्ट्रीय विधि आयोग ने दो विधियों को तैयार किया लेकिन इन्हें एक शीत युद्ध की तरह स्थगित कर दिया गया और एक राजनीतिक रूप से अवास्तविक अंतरराष्ट्रीय आपराधिक अदालत का निर्माण किया गया।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद नाज़ी युद्ध अपराधियों के जांचकर्ता और अमेरिकी अधिकारियों द्वारा नुरेमबर्ग पर आयोजित 12 सैन्य जांचों में से एक आइनसाट्ज़ग्रूपेन मुकदमे पर संयुक्त राष्ट्र सेना के लिए एक मुख्य अभियोजक, बेंजामिन बी फेरेंच्ज़ बाद में एक अंतर्राष्ट्रीय कानून के शासन के स्थापना के साथ ही उसके एक मुखर पैरोकार बन गए। 1975 में उनकी पहली पुस्तक प्रकाशित हुई जिसका नाम डिफाइनिंग इंटरनेशनल अग्रेशन-द सर्च फॉर वर्ल्ड पीस था, इसमें उन्होंने एक अंतरराष्ट्रीय अदालत की स्थापना के लिए तर्क दिया है।

1989 में यह विचार पुनर्जीवित हुआ जब तत्कालीन त्रिनिदाद और टोबैगो के प्रधानमंत्री ए॰एन॰आर॰ रॉबिन्सन ने अवैध दवा व्यापार से निपटने के लिए एक स्थायी अंतर्राष्ट्रीय अदालत के निर्माण का प्रस्ताव किया।जबकि प्रारूप अधिनियम पर काम शुरू किया गया, अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने पूर्व यूगोस्लाविया और रवांडा में युद्ध अपराधियों पर मुकदमा चलाने के लिए तदर्थ अधिकरणों की स्थापना की और एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय की आवश्यकता को उजागर किया।

अगले वर्षों की बातचीत के बाद, महासभा ने संधि को अंतिम रूप देने के उद्देश्य से जून 1998 में रोम में एक सम्मेलन बुलाया। 17 जुलाई 1998 को अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायालय की रोम संविधि को 120 समर्थन वोट और 7 विरोधी वोट द्वारा अपनाया गया जिसमें 21 देशों ने भाग नहीं लिया था। वे सात देश जिन्होंने संधि के खिलाफ अपना वोट दिया था वे थे – चीन, इराक, इजरायल, लीबिया, कतर, संयुक्त राज्य अमेरिका और यमन.

11 अप्रैल 2002 को रोम संविधि एक बाध्यकारी संधि बनी, जब 60 देशों ने इसे मंजूरी दी। कानूनी तौर पर 1 जुलाई 2002 को संविधि को लागू किया गया, और आईसीसी केवल उस तिथि के बाद हुए अपराधों पर ही मुकदमा चला सकती है।फरवरी 2003 में सदस्य देशों की सभा द्वारा 18 न्यायाधीशों के पहले बेंच का चुनाव किया गया। 1 मार्च 2003 को अदालत के उद्घाटन सत्र में उन्होंने शपथ ग्रहण की। अदालत ने अपना पहला गिरफ्तारी वारंट 8 जुलाई 2005 को जारी किया, और पहली पूर्व-जांच की सुनवाई 2006 में आयोजित की गई।

अगस्त 2010 तक 113 देशों ने इस अदालत में भाग लिया, जिसमें यूरोप और दक्षिण अमेरिका के लगभग सभी देश और अफ्रीका के लगभग आधे देश इसमें शामिल हुए.1 नवम्बर 2010 को सेशेल्स और सेंट लूसिया इसके 112 वें और 113 वें संख्या की सदस्य देश बने; 10 अगस्त 2010 में सेशेल्स ने संविधि की पुष्टि की, और 18 अगस्त 2010, को सेंट लूसिया ने संयुक्त राष्ट्र महासचिव को रोम संविधि के अनुसमर्थन के अपने दस्तावेज दिए।

इसके अलावा अन्य 35 देशों ने हस्ताक्षर तो किया लेकिन रोम संविधि का अनुसमर्थन नहीं किया,संधि का कानून इन देशों को “उन अधिनियमों से जो संधि के उद्देश्य और प्रयोजनों को विफल करते हैं” दूर रहने पर बाध्य करता है। इन तीन देशों- इजरायल, सूडान और संयुक्त राज्य- ने रोम संविधि को त्याग दिया है, जो उनके सदस्य देशों में शामिल न होने के इरादे को दर्शाता है और वैसे भी संविधि में उनके हस्ताक्षर से उनके ऊपर कोई क़ानूनी दायित्व नहीं आता है।

 

 

 

During the Paris Peace Conference in 1919, the International Tribunal was established for the first time to prosecute political leaders accused of war crimes by the Commission of Responsibilities. On 1-16 November 1937, the issue was raised once again in Geneva, under the auspices of the League of Nations, but no practical results were obtained. The United Nations said that after the Nuremberg and Tokyo Tribunal, in 1948, the General Assembly identified the need for a permanent international court for the first time to deal with the atrocities committed during World War II. On the request of the General Assembly, 1950s In the beginning, the International Law Commission prepared two methods, but they were postponed like a cold war and one night. Strategic unrealistic built international criminal court.

After the Second World War, Benjamin B. Ferranches, a chief prosecutor for the United Nations Army on an investigation of the Nazi war criminals and one of the 12 military investigations conducted by the US authorities on the Eintsatzgruppen case, was later formed, with the establishment of the rule of an international law. She became an outspoken advocate. In 1975 his first book was published which was named Defining International Aggression-The Search for World Peace, in which he argued for the establishment of an international court.

This idea was revived in 1989 when the then Prime Minister of Trinidad and Tobago ANR Robinson proposed to build a permanent international court to deal with illegal drug trade. While working on the draft Act, the international community In the former Yugoslavia and Rwanda established ad hoc tribunals to prosecute war criminals and once again Trrashtryy exposed the criminal court’s requirement.

After the negotiations of next year, the General Assembly called a conference in Rome in June 1998 with the aim of finalizing the treaty. On July 17, 1998, the Rome Statute of the International Criminal Court was adopted by 120 support votes and 7 anti-vote votes, in which 21 countries had not participated. The seven countries which had voted against the treaty were China, Iraq, Israel, Libya, Qatar, the United States and Yemen.

On April 11, 2002, the Rome Statute became a binding affair, when 60 countries approved it. Legally, the statute was enacted on July 1, 2002, and the ICC can only prosecute the crimes committed after that date. In February 2003, the first of the 18 judges was elected by the Assembly of the member countries. On March 1, 2003, he swore in the inaugural session of the court. The court issued its first arrest warrant on July 8, 2005, and the first pre-investigation hearing was held in 2006.

 

 

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